Thursday, March 17, 2011

'महानायक' का असल जिंदगी में हीरो बनने का सफर



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Written by सतनाम सिंह   

किसी 'महामानव' के बारे में सबकुछ जान पाना असंभव होता है. लेकिन जैसे-जैसे आप उनके जिंदगी के करीब जाते हैं, कुछ अनछुई-अंजानी सी बातें भी सामने आती जाती है. मान्यवर कांशीराम जी के व्यक्तित्व का भी एक ऐसा ही पहलू है. इसमें, उनके मन में भी किसी भी आम इंसान की तरह कई सपने थे. एक सपना मुंबई जाकर हीरो बनने का भी था. लेकिन जिसे महानायक बनना था, वह आखिर सिर्फ नायक बनकर कैसे रह जाता. बहुजन समाज को समर्पित 'शिल्पकार टाईम्स' में सतनाम सिंह द्वारा लिखे एक ऐसे ही लेख के अंश.


जब मैं मान्यवार कांशीराम जी की जीवनी 'बहुजन नायक कांशीराम' लिखने के सिलसिले में 10 जनवरी 2004 को पंजाब में उनकी जन्मभूमि पिरथीपुर बुंगा (बुंगा साहब) गया था तो वहां मैं उनकी माता बिशन कौर जी से भी मिला था. भेंटवार्ता के दौरान कांशीराम जी के बचपन की यादों को कुरेदते हुए उन्होंने यह भी बताया था कि वे कॉलेज टाईम में अलग-अलग मुद्राओं में फोटों खिंचवाने के बड़े शौकीन थे. तस्वीरों को दिखाकर पूछते, 'मां देख, मैं हीरो जैसा लग रहा हूं न? फिर कहते ऐसी तस्वीरें इकठ्ठी करके बंबई जाऊंगा, फिल्म कंपनियों में. इन्हें देखकर वे मुझे जरूर फिल्मों में काम देंगे.'
जब मैने माताजी से वे तस्वीरें दिखानें के लिए मांगी तो उन्होंने कहा था कि 'वह उन्हें तभी अपने साथ ले गया था, जब उसकी पूना में नौकरी लगी थी.' इस प्रसंग का कांशीराम जी के जीवन से कोई तालमेल भी नहीं बैठ रहा था तथा वे तस्वीरें भी मौजूद नहीं थीं. इसलिए मैने इस प्रसंग का जिक्र अपनी पुस्तक में नहीं किया था. लेकिन साहब कांशीराम जी के इस शौक का खुलासा इससे भी पहले उनके चाचा सरदार बिशन सिंह जी भी कार्तिक लोटे को दी अपनी भेंटवार्ता में कर चुके थे. अपनी पुस्तक  लिखने के दौरान यह इंटरव्यूह मैने नहीं पढ़ा था. कांशीराम जी के संपादन में छपने वाले ‘बहुजन नायक’ दैनिक के बहुजन दिवस विशेषांक  1999 में यह जानकारी छपी थी तथा मुझे मेरे बुजुर्ग मित्र, मध्यप्रदेश के जे.बी.कठाणें जी, जो जाने-माने लेखक हैं, ने जानकारी उपलब्ध कराई थी.
इस भेंटवार्ता में साहब के चाचा जी ने कहा था, 'देहरादून की नौकरी ज्वाइन करने से पहले कांशीराम जी को फिल्मी दुनिया में जाने की धुन सवार  हुई थी. वे घर में बराबर फिल्मी पत्रिकाएं लाते थे. देहरादून जाना उन्हें पसंद नहीं था. वे मुंबई के आस-पास ही नौकरी ज्वाइन करना चाहते थे, क्योंकि इससे वह अपने शौक को परवान चढ़ा सकते थे.' कुछ ही दिनों बाद उनकी नौकरी पूना में लग गई और वो अपने सपने के करीब  पहुंच गए. लेकिन ऐसा नहीं है कि कांशीराम जी को अचानक फिल्म स्टार बनने की सूझी हो. उनके चाचा बिशन सिंह ने बहुजन नायक के लिए कार्तिक लोटे को दिए अपने इंटरव्यूह में इसका खुलासा किया था. उनके शब्दों में 'उस समय कांशीराम  बीएससी कर रहे थे. उस समय मुंबई से एक फिल्म कंपनी वाले शूटिंग के सिलसिले में रोपड़ के उसी कॉलेज में आए थे, जहां कांशीराम  पढ़ा करते थे. उस दौर में शाम सिंह नाम का एक फिल्म अभिनेता था. उसी की फिल्म की शूटिंग थी. शूटिंग के दौरान एक स्टंट सीन देते हुए घोड़े से गिरने से उसकी मौत हो गई. फिल्म को पूरा करने के लिए उसी कद-काठी का हीरो चाहिए था. फिल्म से जुड़े लोग रोपड़  कॉलेज पहुंचे. प्रिंसिपल की अनुमति से फिल्मवालों के सामने लड़कों की परेड कराई गई, तो उन्हें कांशीराम पसंद आ गए. उन्होंने कांशीराम को हीरो बनने के लिए कहा लेकिन तब उन्होंने पढ़ाई की बात कह कर इंकार कर दिया. कॉलेज के शिक्षक और दोस्तों के समझाने पर भी वो नहीं माने. बाद में दोस्तों के लानत-मलानत के बाद उन्हें फिल्म छोड़ने का अफसोस भी हुआ था.
लेकिन इस घटना के बाद से  उन्होंने फिल्म स्टार बनने के सपने बुनने शुरू कर दिए.' बात आई-गई हो गई. उनके जीवन की दिशा भी राजनीति की तरफ बदल गई थी. लेकिन बॉलीवुड बाद तक उनका पीछा करता रहा. जब  उन्होंने नकली हीरो बनने की बजाए असली हीरो बनने का प्रण करते हुए नौकरी छोड़ दी तथा अपने बामसेफ, डी.एस.फोर संगठन बनाकर 6  दिसंबर 1982 को चार विशाल साईकिल रैलियां शुरू की. उसी समय एक फिल्म कंपनी को अपनी एक फिल्म में ढ़ेर सारे साईकिल सवारों का दृश्य फिल्माना था. उन्होंने कांशीराम जी की साईकिल रैलियों के बारे में सुना. उन्होंने कांशीराम जी से इसे फिल्माने की अनुमति मांगी तो वो तैयार हो गए. वह सिनेमा को जनजागरण का महत्वपूर्ण हथियार मानते थे. इसका प्रमाण है, उनके द्वारा बनवाई गई फिल्म 'इंसाफ की आंधी'. कांशीराम जी ने स्वयं क्लैपिंग करके इस फिल्म की शूटिंग का उदघाटन किया. इस फिल्म का दृश्य देखते हुए वह किस तरह रो पड़े थे, इसका संस्मरण लेखक एवं कांशीराम जी के सहयोगी रहे आनंद रहाटे जी के लिखे 'नारी का दर्द देखा नहीं गया... और वो रो पड़े' में मिलता है. रोहाटे लिखते हैं 'छत्तीसगढ़ बिलासपुर जिले के अंतर्गत आने वाले शिवरीनारायण गांव के मेले में मीनाकुमारी खुंटे नामक आदिवासी महिला पर मंदिर के पुजारी, गांव के ठाकुर एवं लाला केसरवानी नामक बनिया ने मिलकर बलात्कार किया था. मीनाकुमारी खुंटे जब इंसाफ की गुहार करती जब थाने पहुंची तो बजाए उसकी शिकायत सुनने के थानेदार ने सर्वणों का पक्ष लेते हुए उसे डांट कर भगा दिया. इंसाफ नहीं मिलने से थककर पीड़िता ने जान देने की कोशिश भी की लेकिन पति महादेव खुंटे ने उसे बचा लिया.' खुंटे दंपत्ति को कानून से न्याय नहीं मिलने पर बहुजन समाज पार्टी की छत्तीसगढ़ इकाई ने इस घटना को लेकर तीव्र आंदोलन किया, सारे छत्तीसढ़ में 'इंसाफ की आंधी' का निर्माण हुआ, आखिरकार बसपा कार्यकर्ताओं ने मीनाकुमारी से दुष्कर्म करने वालों को जेल की सलाखों के भीतर पहुंचा कर ही दम लिया. इसी घटना पर आधारित फिल्म ‘इंसाफ की आंधी’ का निर्माण कांशीराम ने करवाया था. फिल्म की शूटिंग के दौरान नायिका की इज्जत लुटने के बाद थाने का दृश्य फिल्माया जा रहा था. नायिका इंसाफ के लिए चिल्ला रही थी. कांशीराम जी यह दृश्य देख रहे थे और पल-पल उनके चेहरे के भाव बदल रहे थे, मानों वह दृश्य जिंदा होकर अपने जेहन को डस रहा हो. चेहरे पर वेदना की लकीर गहरी होती जा रही थी. वह पीड़िता मीनाकुमारी के बेबस आंसू देख चुके थे और उससे काफी आहत हुए थे. उनकी आंखे डबडबा गई और वो अपने आंसू रोक नहीं पाए.
लेकिन जिन लोगों को वास्तविक जीवन में महानायक बनना होता है, वे पर्दे के 'नकली नायक' बनकर संतुष्ट नहीं हो जाते. कच्ची उम्र की दहलीज को जैसी ही उन्होंने पार किया वे ठोस बातों की तरफ ध्यान देने लगे थे और असली नायक बनने की दिशा में प्रयास करने लगे थे. आज हम सोचते हैं कि यदि बहुजन नायक कहीं सच में ही फिल्मी जगत के नायक मात्र बनकर रह गए होते तो आज दलित बनकर बिखरे इस समाज को बहुजन समाज में कौन बदलता. गहरी नींद में सोई हुई बेफिक्र कौम को कौन जगाता. बहुजनों के भीतर राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक चेतना को कौन उभारता. जो महान कार्य उन्होंने कर दिए वे कार्य किसी नायक के नहीं बल्कि 'महानायक' के हैं.


लेखक जाने-माने दलित साहित्यकार हैं और दलित हितों से जुड़े विषयों पर धारदार लेखनी के माध्यम से अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते हैं.

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