Sunday, July 24, 2011

प्रमोशन और साहित्य का संकट




  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

    वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।
  • यूजर ऑनलाइन

कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं। आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं,वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए। वक्तागण आशीर्वाद देते हैं,पैर छुआते हैं। इस समूची प्रक्रिया में कई लोग तो इस कदर नशे में आ गए हैं कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है कि शहर में कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो उनको अध्यक्षता के लिए बुलाओ,ये लोग अध्यक्ष न बनाए जाने पर कार्यक्रम में जाते नहीं है। नहीं बुलाने पर नाराज हो जाते हैं। इन पंडितों का मानना है वे जिस सेमीनार में जाते हैं उस सेमीनार को सार्थक करके आते हैं। इस प्रसंग में मुझे कई लेखकों की रचनाएं याद आ रही हैं। इनमें सबसे पहले में मुक्तिबोध को उद्धृत करना चाहूँगा। बहुत पहले मुक्तिबोध ने हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में लिखा, ”बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।”
मुक्‍ति‍बोध ने यह भी लि‍खा है ” चूँकि प्रोफेसर महोदय साहि‍त्‍यि‍क हैं इसलि‍ए शायद वे यह कुरबानी नहीं कर सकते। नाम- कमाई के काम में चुस्‍त होने के सबब वे उन सभी जगहों में जाएंगे जहॉं उन्‍हें फायदा हो-चाहे वह नरक ही क्‍यों न हो।”
कोलकाता के शिक्षकों की अवस्था इससे बेहतर नहीं बन पायी है। हिन्दी के इस तरह के आयोजनों में किस तरह के भाषण होते हैं और चेले-चेलियां किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं इस पर कवि -कहानीकार उदयप्रकाश की बड़ी शानदार कविता है ‘पाँडेजी’ उसका अंश देखें-
“छोटी-सी काया पाँडेजी की/छोटी-छोटी इच्छाएँ/ छोटे-छोटे क्रोध/और छोटा दिमाग।
गोष्ठी में दिया भाषण,कहा- ‘नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है ‘/फिर हँसे कि ‘ मैंने देखो
कितनी गोपनीय/चीज को खोल दिया यों।यह तीखी मेधा और/वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है। ‘/एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-’ भाषण लाजबाब था /अत्यन्त धीर-गंभीर/
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक/हिन्दी आलोचना के खच्चर/ अस्तबल में/आप ही हैं /एकमात्र/काबुली बछेड़े/ ‘तो गोल हुए पाँडे जी/मंदिर के ढ़ोल जैसे/ठुनुक -ठुनुक हँसे और/फिर बुलबुल हो गए/फूलकर मगन !”
मैं 20 सालों से कोलकाता में रह रहा हूँ और आए दिन हिन्दी सेमीनारों की दुर्दशापूर्ण अवस्था के किस्से अपने दोस्तों और विद्यार्थियों से सुनता रहा हूँ। मैं आमतौर पर इन सेमीनारों से दूर रहता हूँ। इसके कारण लोग यह मानने लगे हैं कि मैं साहित्य के बारे में नहीं जानता। कई मित्र हैं जो सेमीनार के कार्ड में वक्ता के रूप में मेरा नाम न देखकर दुखी होकर फोन करते हैं कि यहां तो आपको होना ही चाहिए था। मेरी स्थिति इस कदर खराब है कि एकबार कोलकाता की सबसे समर्थ साहित्यिक संस्था की कर्ताधर्ता साहित्यकार नेत्री ने चाय पर अपने घर बुलाया और कहा कि हम इतने कार्यक्रम करते हैं और आपस में बातें भी करते हैं कि स्थानीय स्तर पर कौन विद्वान हैं जिन्हें बुलाया जाए तो लोग आपका नाम कभी नहीं बताते, मैं स्वयं भी नहीं जानती कि आप विद्वान हैं। मैंने कहा मैं विद्वान नहीं हूँ। इसी प्रसंग में मैंने उन्हें त्रिलोचन की एक कविता ‘ प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है’ सुनायी, कविवर त्रिलोचन ने लिखा- ” प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है/उसमें कहीं त्रिलोचन का नाम नहीं था/आँख फाड़कर देखा/दोष नहीं था/पर आँखों का/सब कहते हैं कि प्रेस छली है/शुद्धिपत्र देखा ,उसमें नामों की माला छोटी न थी/ यहाँ भी देखा ,कहीं त्रिलोचन नहीं/तुम्हारा सुन सुनकर सपक्ष आलोचन कान पक गए थे/मैं ऐसा बैठा ठाला नहीं,तुम्हारी बकबक सुना करूँ/किसी जगह उल्लेख नहीं है,तुम्हीं एक हो,क्या अन्यत्र विवेक नहीं है/ तुम सागर लाँघोगे ? -डरते हो चहले से/बड़े-बड़े जो बात कहेंगे-सुनी जायगी/व्याख्याओं में उनकी व्याख्या चुनी जाएगी/”
कोलकाता हिन्दी के क्षयिष्णु वातावरण का एक अन्य पक्ष है हिन्दी के पठन-पाठन की ह्रासशील अवस्था। यह स्थिति कमोबेश पूरे राज्य में है। मसलन जो आज छात्र है वह कल शिक्षक होगा।जो विद्यार्थी एम.ए. में आते हैं उनमें अधिकांश ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं जानते । अब आप ही सोचिए कि जो विद्यार्थी एम.ए. तक आ गया वह हिन्दी लिखना नहीं जानता। इस तरह के विद्यार्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उच्च शिक्षाकी सुविधाओं का निचलेस्तर पर विस्तार हुआ है। बड़े पैमाने पर छात्र हिन्दी ऑनर्स कर रहे हैं , वे जब ठीक से हिन्दी लिखना नहीं जानते,ठीक से प्रश्नों का उत्तर तक नहीं देते तब वे कैसे एम.ए. तक अच्छे अंक प्राप्त करके आ जाते हैं, इसका रहस्य कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कोलकाता में हिन्दी में अंक कैसे दिए जाते होंगे। हिन्दी प्रमोशन के नाम पर बड़े पैमाने पर ऐसे छात्रों की पीढ़ी तैयारहुई है जो येन-केन प्रकारेण अंक हासिल करके पास हुए हैं। पढ़ने,समझने और सीखने की आदत बहुत कम विद्यार्थियों में है। जिनमें यह आदत है उन्हें पग-पग पर छींटाकशी, अपमान और अकल्पनीय असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कोलकाता में सारे विद्यार्थी जानते हैं कि हिन्दी में नौकरी पाने के नियम क्या हैं ? किसके हाथ में नौकरियां हैं ? किस नेता और प्रोफेसर को पटाना है और कैसे पटाना है । इस समस्या की जड़ें गहरी हैं,गहराई में जाकर देखें तो हिन्दी के शिक्षक नए से डरते हैं,विचारों का जोखिम उठाने से डरते हैं। अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने में अपनी हेटी समझते हैं। साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इनकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपने पेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नाते उनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरह अतीत के रेतीले टीले में सिर गडाए बैठे हैं।
हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय को अनुसंधान का जरिया नहीं बना पाए है। विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता बनाए रखने में इस तरह के शिक्षकों की बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते। कायदे से शिक्षक को पारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा है।हिन्दी के शिक्षक कम ज्ञान में संतुष्ट,आरामतलब,और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में मशगूल रहते हैं।
इसके विपरीत यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध करतााहै या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने और केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षकगण सबसे आगे होते हैं। और कहते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं। यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते हैं कि फलां का लिखा अभी तक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पाती है तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छा नहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहीं पर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इस तरह की मनोदशा के प्रतिवादस्वरूप त्रिलोचन ने लिखा है- “शब्द/ मालूम है/व्यर्थ नहीं जाते हैं/पहले मैं सोचता था/उत्तर यदि नहीं मिले /तो फिर क्या लिखा जाय/किन्तु मेरे अन्तरनिवासी ने मुझसे कहा- लिखाकर/तेरा आत्म-विश्लेषण क्या जाने कभी तुझे/एक साथ सत्य शिव और सुंदर को दिखा जाय/अब मैं लिखा करता हूँ/अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने/कागज पर बस उतार देता हूँ/”
हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। वे किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिक बहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तो एक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छित मानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।
परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है।परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है। परंपरा का मूल्यांकन करते हुए जो लेखक-शिक्षक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया। परंपरा के बारे में हमारे यहां तीन तरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ को स्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकी पर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों ही दृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन किया जाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है। यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूब पाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता। नया नहीं बनाया जा सकता। परंपरा के पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसे पहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिक बनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आज किसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं, नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जब पुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक का अंग है।
हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी में लिखे जा चुके हैं।सालाना 7 हजार से ज्यादा शोध प्रबंध हिन्दी में जमा होते हैं। लेकिन इनमें एक फीसद शोध प्रबंधों में भी सामयिक समाज की धड़कन सुनाई नहीं देगी। हमें विचार करना चाहिए कि रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवर सिंह,विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय,शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह ,परमानन्द श्रीवास्तव,नन्दकिशोर नवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा है ? इसका यदि हिसाब फैलाया जाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा ? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।

Wednesday, July 20, 2011

श्रमण संस्‍कृति का बौद्ध दर्शन ही वर्तमान समस्‍याओं का सही निदान हो सकता है

 by Sheel Bodhi on Wednesday, July 20, 2011 at 11:30pm


जयप्रकाश कर्दम जी की बातों से मैं सहमत हूं लेकिन जाति व्‍यवस्‍था या वर्ण व्‍यवस्‍था अपने आप में एक स्‍वतंत्र व्‍यवस्‍था नहीं है। जाति या वर्ण की व्‍यवस्‍था के बदल देने से बदलाव आ ही जाएगा यह जरूरी नहीं है। जाति या वर्ण आधारित व्‍यवस्‍था संस्‍कृति के साथ जुडा एक गहरा मामला है। जाति या वर्ण जैसी व्‍यवस्‍था को हटा भी दिया जाए तब भेदभाव पर आधारित कोई दूसरी व्‍यवस्‍था उत्‍पन्‍न हो जाएगी। मामला संस्‍कृति के अन्‍तर्भूत तत्‍व दर्शन का है। चीजें जैसी है उन्‍हें वैसा नहीं देखा जा रहा है। अपितु वैसा देखा जा रहा है जैसा कि हिन्‍दू संस्‍कृति के दर्शन के द्वारा दिखाया जा रहा है। इसलिए मेरा मानना है कि भ्रष्‍टाचार जैसे मामलों को हल करने के लिए आर्य संस्‍कृति की अपेक्षा श्रमण संस्‍कृति के दर्शन को जनमानस में प्रचारित व प्रसारित किए जाने की जरूरत है। चार्वाक, आजीवक, जैन और बौद्ध दर्शन श्रमण संस्‍कृति से जुडे अभिन्‍न भाग है। चार्वाक व आजीवक दर्शन का मूल ग्रंथ या प्रमाणित साहित्‍य हमारे पास नहीं है और महावीर के 12 पूर्व भी महाबली के समय तक लूप्‍त हो चुके थे, अंक और उपांग के रूप में निर्मित साहित्‍य प्रवर्तित काल का साहित्‍य है, जैसे कि सांख्‍य दर्शन के ऊपर ईश्‍वर कृष्‍ण के भाष्‍य। बौद्धों का साहित्‍य देखा जाए तो भगवान बुद्ध की मुत्‍यु के एक सप्‍ताह के भीतर ही संकलन करना शुरू किया जा सका था, इसलिए सुत्र व विनय पिटक मौलिकता के सर्वाधिक करीब की रचना हैं। ये दो पिटक व्‍यक्ति पूजा से प्रेरित नहीं है और न ही व्‍यक्ति विशेष के प्रति आस्‍थावान है, बल्कि आदमी को कोरा बनाकर उसे विवेकशील बनाने के धेय के साधक हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि जब बुद्ध शिक्षाओं का संकलन व संग्रहण हो रहा था तब किसी ने भी बुद्ध की जीवनी नहीं लिखी और न ही इसपर जोर दिया गया था। इसलिए श्रमण संस्‍कृति का प्रतिनिधि स्‍वर बौद्ध दर्शन ही है जो व्‍यक्ति को विवेकशील बनाकर व्‍यक्ति को इस काबिल बनाता है ताकि वह अपने निर्णय स्‍वयं तैयार कर सके। सम्‍यक दृष्टि के द्वारा यथार्थ को यथार्थ रूप में देख सके। यही यथार्थवादी दृष्टि केवल  भ्रष्‍टाचार को ही नहीं बल्कि मनुष्‍य समाज की और दूसरी बुराईयों का अंत करेगी। श्रमण संस्‍कृति का एक बड़ा गुण यह है कि यह व्‍यक्ति को आत्‍मकेन्द्रित नहीं बनाता है। इस दर्शन की पूजा विधि ही आत्‍म सुधार से शुरू होकर सब्‍ब सत्ता सुखी होन्‍तु की भावना से समाप्‍त होती है। आर्य संस्‍कृति में सभी कुछ आत्‍म केन्द्रित है। यहां केवल एक ही शिक्षा है, और वह शिक्षा है जो  मांगना है केवल अपने लिए ही मांगना है। अपने लिए मांगने की यह प्रवृति जन्‍म के साथ सिखाई जाती है और मूत्‍यु पर्यंनत तक व्‍यक्ति के अंतर्मन में अवस्थित रहती है, जिससे एक प्रकार का सामाजिक अनुशासन सामने आता है जिसका नाम  भ्रष्‍टाचार है। इसलिए मामला केवल वर्ण या जाति की  प्रथाओं का ही नहीं है बल्कि मुख्‍य मुद्दा तो आर्य संस्‍कृति के स्‍थान पर लोक कल्‍याणकारी श्रमण संस्‍कृति के अनुसार व्‍यक्ति के निर्माण का है। 

दलित लेखक संघ- लेखक से मुलाकात कार्यक्रम में माता प्रसाद जी

दलित लेखक संघ
दिनांक 19 जुलाई 2011
लेखक से मुलाकात
  कार्यक्रम का संक्षिप्‍त विवरण
वरिष्‍ठ लेखक मा. माता प्रसाद जी के साहित्‍य पर बातचीत के लिए एक कार्यक्रम मोहन सिंह प्‍लेस के इंडियन कॉफी हाऊस में रखा गया। जिसमें मुख्‍य अतिथि के रूप में जयप्रकाश कर्दम थे। मंच का संचालन मा.मुकेश मानस ने किया। 
                                                                                                                                             
दलित आंदोलन में ठहराव क्‍यों ?... :मा. माता प्रसाद
नई दिल्‍ली के क्‍नॉट प्‍लेस स्थित मोहनसिंह प्‍लेस इंडियन कॉफी हाऊस में दलित लेखक संघ ने लेखक से मुलाकात कार्यक्रम रखा। जिसमें नाटककार व कवि मा.माता प्रसाद जी से मुलाकात की गई। इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता मा. जयप्रकाश कर्दम, प्रख्‍यात साहित्‍यकार ने की तथा मंच संचालन मा. मुकेश मानस ने किया।
        अपना वक्‍तव्‍य देते हुए  मा. माता प्रसाद जी ने कहा कि पहले हम लोगों को हरिजन या अछूत कहा जाता था। बाद में दलित शब्‍द आया। दलित साहित्‍य की पृष्‍ठभूमि लोकगीतों से निर्मित है। आजादी के बाद जो पढ़ी लिखी पीढ़ी आई उसने साहित्‍य रचना आरम्‍भ किया और सन् 1980 के आसपास सही तरीके से दलित साहित्‍य लेखन आया। अब जो साहित्‍य आ रहा है वह मुख्‍यधारा के साहित्‍य से टक्‍कर ले रहा है। अभी तक जो मुख्‍यधारा का साहित्‍य लिखा गया उसमें सामने की तसवीर ही आई, पीछे का कुछ नहीं आया, पीछे जो था वह दलित था जो साहित्‍य में दिखाई नहीं दे रहा था। अब दलित साहित्‍य आने से दर्पण में जो छिपा हुआ था वह दिखाई देने लगा है। उन्‍होंने यह भी कहा कि दलित साहित्‍य का विस्‍तार विभिन्‍न विधाओं में होना चाहिए।
उन्‍होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ठहराव क्‍यों दिखाई दे रहा है, आंदोलन कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। आंदोलन में ठहराव की स्थिति से आंदोलन कमजोर पड़कर बहुजन से सर्वजन हो गया है। ब्राह्मण साफ, क्षत्रिय हाफ और बनिया माफ। मा. माता प्रसाद जी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि राजनीति सब तालों की कुंजी नहीं है। जब तक सामाजिक व सांस्‍कृतिक परिवर्तन नहीं होते हैं तब तक परिवर्तन नहीं होता है। डॉ. अम्‍बेडकर ने यही बात रखी है। राजनीति से सत्ता पाई जा सकती है लेकिन बदलाव के लिए सांस्‍कृतिक परिवर्तन जरूरी हैं।  राजनीति से निकलकर हमें राजनैतिक सामाजिक परिवर्तन में जाना चाहिए। इसलिए सामाजिक व सांस्‍कृतिक व्‍यवस्‍था में आमूल चूल परिवर्तन जरूरी हैं। आगे उन्‍होंने कहा कि पार्टी प्रथा में एक बुराई है कि हमें पार्टी का अनुशासन मानना होता है, इसलिए कभी-कभी ऐसा वक्‍त भी आता है जब अपना अहित, अपने समाज का अहित हो रहा होता है तब भी हमें उसका समर्थन करना पड़ता है। हम अलग-अलग पार्टियों में रहे लेकिन जो हमारे समाज का कॉमन इंटरेस्‍ट है, उसके लिए एक मंच पर आना चाहिए।
        भट्टा मज़दूर, बेडित जाति, शरणार्थी, पीडि़त लोगों को हमें अपने साथ लेना चाहिए। पिछडी जाति के शुद्र लोग अब जातिवादी हो गए हैं। ये लोग अछूतों के साथ ज्‍यादा दुर्व्‍यवहार करते हैं। शुद्र और अछूत लेखकों को एक साथ बैठकर सोचना चाहिए जिससे नई राह निकलेंगी। उन्‍होंने कहा कि आरक्षण को हम अच्‍छा नहीं मानते परन्‍तु आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक बराबरी देनी होगी यदि यह मिले तो हम आरक्षण का विरोध करेंगे। महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए बल्कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए, जिससे नेतृत्‍व उभरे और समानता आए और समाज का भला हो।
अपने वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने यह भी कहा कि मिड डे मील योजना में छुआछूत की जो घटनाएं सामने आई हैं। उससे सरकार को दलित महिलाओं को वहां से नहीं हटाना चाहिए। इससे समाज पर बुरा असर पड़ता है। सार्वजनिक स्‍थानों पर छुआछात एक अपराध है, इसलिए यह नहीं होना चाहिए। मा. माता प्रसाद ने कहा कि किसानों और बुनकरों का ऋण माफ किया गया है पर आईआरडीपी/एसपीसीपी के तहत जो दलितों को दिया गया ऋण है सरकार उसे माफ क्‍यों नहीं करती। इसे सरकार के द्वारा माफ किया जाना चाहिए। उन्‍होंने भ्रष्‍टाचार पर रोशनी डालते हुए कहा कि भ्रष्‍टाचार में दलित समाज के लोग ज्‍यादातर नहीं है क्‍योंकि राजनीति में उनके सरंक्षक नहीं है इसलिए वे भ्रष्‍टाचारी नहीं होते। उन्‍हें डर होता है कि वे पकड़े जाएंगे। भ्रष्‍टाचार पर सरकार को कड़ा होना चाहिए।
मा. माता प्रसाद जी का वक्‍तव्‍य समाप्‍त होने पर मा. अजय नावरिया जी ने पूछा कि परिवर्तन के लिए राजनीति महत्‍वपूर्ण है या धर्म। जिसका जवाब देते हुए मा. माता प्रसाद ने कहा कि सांस्‍कृतिक परिवर्तन जरूरी है क्‍योंकि बड़ी संख्‍या में लोग जुडेंगे तो लोगों में सामाजिकता की भावना आयेगी फिर आर्थिक प्रश्‍न भी हल किए जाए, राजनीति से सभी परिवर्तन नहीं होते हैं।
बेधडक न्‍यूज मासिक के संपादक जसवंत सिंह बेधडक ने प्रश्‍न किया कि दलितों की दुर्दशा के लिए कांग्रेस कितनी जिम्‍मेदार है, का उत्तर देते हुए मा. माता प्रसाद जी ने कहा कि कांग्रेस ने बाबा साहब को मौका दिया जिससे संविधान बना और आज हमें आरक्षण भी बाबा साहब के द्वारा बने संविधान के कारण ही मिल रहा है। उसका श्रेय कांग्रेस को है। आजादी के बाद जमींदारी खत्‍म हुई, हमने जमींदारी का दौर देखा है, कांग्रेस ने जो बदलाव की बयार दी उससे मुक्ति की तड़प जागी। आज हमारे लोग अधिकारी बन गए हैं, यह सब कांग्रेस ने किया है।
जवाहर लाल नेहरु विश्‍वविद्यालय के शोधार्थी मा. सर्वैश कुमार मौर्या ने पूछा कि रोटी बेटी के संबंध को दलित मुक्ति के लिए कितना महत्‍वपूर्ण मानते हैं का जवाब देते हुए उन्‍होंने कहा कि मैंने अपने नाटक अछूत का बेटा में रोटी बेटी का प्रश्‍न उठाया था। सामाजिक परिवर्तन में रोटी बेटी के संबंध सहायक के रूप में काम करते हैं।
वार्तालाप को आगे बढ़ाते हुए मा.शीलबोधि ने पूछा कि पिछले दौर में नौंटकी मे माध्‍यम से दलितों के पास रंगमंच था, आज दलितों के पास रंगमंच नहीं है, इसके लिए क्‍या होना चाहिए का जवाब देते हुए उन्‍होंने कहा कि दलित रंगमंच बनना चाहिए जिससे मंचन व अन्‍य चीजे प्रभावी तौर पर बने। नुक्‍कड़ नाटक लिखे जाने चाहिए। समाज हमारा अभी पढ़ा-लिखा नहीं है, इसलिए रंगमंच ही परिवर्तन का जरिया बनेगा।
मा. अजय नावरिया ने पूछा कि आपकी आत्‍मकथा क्‍यों चर्चित नहीं हुई पर मा. माताप्रसाद जी ने कहा कि मेरी आत्‍म कथा का एक बड़ा भाग राजभवन से जुडा हुआ था, शायद इसलिए।
अपना अध्‍यक्षीय भाषण करते हुए मा. जयप्रकाश कर्दम ने कहा कि दिल्‍ली आज दलित साहित्‍य के नामपर लेखकों का केन्‍द्र है। प्रबुद्ध लोगों के बीच अंतर्विरोध लाजमी हैं। और असहमति को तरजीह देना चाहिए। व्‍यक्तिगत संवाद चलता रहना चाहिए। हमारी असहमतियां जरूरी काम करती हैं। लेखक संकीर्ण नहीं हो सकता। सन् 1980 में मा. माता प्रसाद जी ने कहा था कि दलित शब्‍द बाद में आया यह सही है कि यह बाद में आया। बाबा साहब के यहां अनटचेबल शब्‍द था। बहुजन संगठन, ओप्रेस्‍ड इंडिया आदि कांशीराम के शब्‍द थे पर दलित बाद में आया। हमें मनुष्‍य को जाति के खांचे में नहीं बांटना चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें अधिकार नहीं है कि हम सवर्णों की आलोचना करें। हमें अपना विस्‍तार करके एक सामाजिक ग्रुप बनना चाहिए। हमें किसी भी विचार में प्रगतिशीलता की बहुसंख्‍या देखनी चाहिए। हमारे आंदोलन की सोच बड़ी होनी चाहिए उन्‍होंने आगे कहा कि लक्ष्‍मण गायकवाड की उचल्‍या  घुमन्‍तू समाज पर है वे हमारे प्रतिष्ठित लेखक हैं। जिस समाज से हमारे महत्‍वपूर्ण नारायण सुर्वे-संजय नवले भी  जैसे लेखक भी हैं। कुछ लोग उन्‍हें अलगा रहे हैं। मा. कर्दम ने आगे कहा कि आज हमें फुले रैदास व नारायण गुरू से अलग नहीं होना चाहिए। यह कहना कि केवल अम्‍बेडकर चाहिए, ठीक नहीं है। हमें सभी लोगों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्‍होंने मा.माता प्रसाद के वक्‍तव्‍य पर बोलते हुए कहा कि विस्‍थापन का सवाल जो माता प्रसाद जी ने उठाया, वह बहुत महत्‍वपूर्ण है। हमारी समाज व्‍यवस्‍था के चलते, औरत से ज्‍यादा विस्‍थापन का दंश सहती है। माता प्रसाद जी की आत्‍म कथा में झौंपड़ी से शुरू होने वाला संघर्ष महत्‍वपूर्ण है, लेकिन जैसा उन्‍होंने कहा कि राज्‍यपाल वाला अंश ज्‍यादा है। ज्‍यादा आत्‍मकथाएं वे चर्चित हुई जो स्‍थापित लेखकों ने लिखी। माता प्रसाद जी बहुआयामी व्‍‍यक्तित्‍व वाले लेखक हैं इसलिए चर्चा ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण नहीं है। मा. कर्दम जी ने अपनी बात समाप्‍त करते हुए कहा कि आंदोलन में व्‍यक्ति नहीं विचार प्रमुख होने चाहिए। दलित आंदोलन की त्रासदी यही है कुछ नामों के चलते यह आरोप लग रहा है। नई पीढ़ी स्‍पष्‍ट और बढि़या लिख रही है। यह एक चरण है इसे ठहराव नहीं माना जा सकता है।
इस मौके पर दलित लेखक संघ की अध्‍यक्षा मा. रजनी तिलक ने मा. माता प्रसाद और मा. जयप्रकाश कर्दम का कार्यक्रम में महत्‍वपूर्ण उपस्थित के लिए आभार प्रकट किया। कार्यक्रम में धन्‍यवाद शीलबोधि ने किया।  

शीलबोधि, महासचिव
                                                                                                                             सर्वेश कुमार मौर्या, सचिव
दलित लेखक संघ
दिनांक 20 जुलाई 2011