Friday, May 6, 2011

सीधा प्रसारण

    यह अनीता भारती जी  की नई कहानी है आशा है अच्छी लगेगी सर्वेश कुमार मौर्या 

सुबह की चाय की चुस्की के साथ ही उसने गोल करके फोल्ड की गई अखबार में लगी रबड़ को हटाया और अखबार फैला कर अपने सामने रखा. पहली हेडलाईन में किसी किशोरी प्रियंका की आत्महत्या की खबर छपी थी. उसको आत्महत्या के लिए उकसाने के पीछे किसी बड़े नौकरशाह का हाथ बताया गया था. खबर थी कि नौकरशाह उस किशोरी से अपनी हवस पूरी करना चाहता था और किशोरी के मना करने पर उसने जीना हराम कर देने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी.  लगातार तंग किए जाने से बेहद परेशान उस किशोरी ने आखिरकार खुद को फांसी पर लटका लेना ज्यादा आसान समझा.
पूरी खबर वह उत्सुकता से पढ़ गया. खबर ने उसे काफी विचलित कर दिया था. प्रियंका किसी शिक्षित और ऊंचे खानदान की लड़की थी, यह खबर के साथ छपे फोटो से पता चल रहा था. बड़ी-बड़ी आंखें, अच्छे से संवारे हुए बाल. स्कूल की वर्दी में छपे उसके फोटो को देखकर ही लग रहा था कि वह किसी अच्छे स्कूल में पढ़ती रही होगी. खबर में बताया गया था कि प्रियंका एक प्रतिभाशाली लड़की थी. पढ़ाई के अलावा खेलकूद में भी वह हमेशा अव्वल रहती थी. ऐसी होनहार लड़की को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देना भास्कर को हृदय को भीतर तक दुखा गया. भास्कर को उसमें अपनी ही तरह के किसी परिवार की बच्ची नजर आई. भास्कर के मुंह से आह निकल गई. गुस्से में उसकी नसें फड़क उठी. उसे लगा कि अगर कहीं वह कमीना नौकरशाह मिल जाए तो वह उसका का खून पी जाए. उसके मन में रोष भर गया. उसने उसी रोष में अखबार के अन्य पन्ने पलटने शुरू किए. दूसरा पन्ना दिल्ली- देहात की खबरों पर था. पूरा का पूरा पन्ना मारधाड़, चोरी, हत्या या अपहरण की खबरों से भरा पड़ा था. ऊपर से फिसलती हुई उसकी निगाह पन्ने में सबसे नीचे लिखी तीन लाईनों की एक खबर पर गई जिसमें एक दलित किशोरी सुनीता की गांव के दबंगो ने बलात्कार करने के बाद जिंदा जला कर हत्या कर दी थी. उसके मुंह से उफ्फ निकला.
उसका मन अखबार से उकता चुका था. उसने अखबार मोड़ कर रखा और किचन में अपने लिए चाय बनाने चला गया. चाय बनाते-बनाते भास्कर ने अपने डेली-रुटीन के मुताबिक सबसे पहले मां को फोन लगाया और प्रणाम करते हुए उनका हालचाल पूछा. रोज की तरह मां की आवाज में रुंआसेपन की जगह आज खुशी टपक रही थी. मां कह रही थी- बचुआ कब तक अकेले-अकेले अपने हाथ से सेंककर रोटी खाओगे. हमने तुम्हारे लिए रोटी सेकने वाली ढूंढ़ ली है. लड़की एमए पास है. खूब गोरी है, तुम्हारे साथ जोड़ी खूब जंचेगी. लेने- देने की बात सब तुम्हारे चाचा कर लेंगे. हमने उन्हें बता दिया है कि हमारा भास्कर दिल्ली में रहता है और वहीं सेटल होना चाहता है, इसलिए आप समझिए कि आप भास्कर की जगह अपनी बेटी को ही सेट करेंगे.
भास्कर पिछले कुछ सालों से दिल्ली में रह रहा था. पता नहीं क्यों उसे बचपन से ही दिल्ली जाकर पढ़ने और बसने की ललक थी. बारहवीं के बाद उसने यहीं आकर दिल्ली के एक जाने-माने पत्रकारिता संस्थान से पत्रकारिता में डिप्लोमा कर लिया. उसके चाचा उमाशंकर दुबे इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित अखबार में सहायक संपादक थे. इस कारण उसे दिल्ली में एक दैनिक अखबार में रिर्पोटर की नौकरी सहज ही मिल गई. उसे 'अपराध जगत' पर प्रतिदिन कॉलम लिखना होता था, सो 'प्रियंका आत्महत्या केस' और 'सुनीता बलात्कार-हत्या केस' उसके पास आ गया. अब उसे दोनों केस पर एक साथ काम करना था. उसने तय किया कि 'सुनीता केस' की रपट तो अपने गांव के रिसोर्स से मंगवा लेगा पर 'प्रियंका केस' पर वह खुद फील्ड में जाकर खोजबीन कर रपट लिखेगा. उसे अखबार के संपादक ने भी हिदायत दी थी कि वह प्रियंका आत्महत्या केस पर गंभीरता से काम करे. लोगों की रुचि ऐसे ही 'हाई प्रोफाईल केसों' में अधिक होती है. संपादक ने भास्कर को भरोसा दिया कि प्रियंका आत्महत्या केस को 'स्पेशल स्पेस' दिया जायेगा और रिपोर्टिंग में भी रोज भास्कर का नाम ही जाना तय हुआ. भास्कर ने मन में सोचा कि वह ऐसे स्वर्णिम अवसर को कभी हाथ से नहीं जाने देगा. प्रियंका केस के माध्यम से वह समाज में अपनी सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध पत्रकार की छवि बनाकर रहेगा.
भास्कर ने सबसे पहले 'सुनीता केस' की रपट के लिए गांव में काम कर रही रंजना से बात करने की सोची. रंजना उसके कॉलेज के समय की मित्र थी. आजकल वह गांव में ही रहकर वहां एक स्वयंसेवी संस्था 'जनचेतना' में काम कर रही थी. भास्कर ने गांव में फोन लगाया. फोन लगते ही भास्कर ने कहा- “रंजना, तुम्हारे गांव से कुछ मील दूर छिनौरा गांव में एक दलित लड़की सुनीता के साथ बलात्कार की घटना हुई है. क्या तुम उस मामले के बारे में किसी को अपने ऑफिस से भेजकर घटना का डिटेल्स पता करवाकर मुझे बता सकती हो. मैं वहां जरूर आता, लेकिन इसी तरह के एक और केस के सिलसिले में मुझे चंडीगढ़ जाना पड़ रहा है." दूसरी तरफ से रंजना ने कहा- “अच्छा हुआ तुमने मुझे फोन कर लिया. मैं भी आज जनचेतना की तरफ से छिनौरा जा रही हूं. घटना की जानकारी लेने. तुम बेफ्रिक होकर चंडीगढ जाओ. गांव से लौटकर मैं तुम्हें पूरा ब्योरा दे दूंगी." भास्कर निश्चिंत हो गया. रंजना ने कई बार ऐसे ही संकट के समय बडी़ ईमानदारी के साथ उसकी मदद की है और अब भी करेगी. भास्कर को पता है कि खबर की तह तक जाने के लिए रंजना किसी तरह की कोई कमी नही छोडे़गी. 

भास्कर ने 'सुनीता केस' के बारे में सोचना छोड़ अपना पूरा ध्यान 'प्रियंका केस' की ओर लगा दिया. अब भास्कर को प्रियंका की आत्महत्या से संबंधित नयी-नयी खबरें रोज  मिल जाती थीं. वह रोज इस कांड के नए राज पर्दाफाश करना चाहता था. उसे खबरों का खिलाड़ी माना जाता था. उसने अपने फोटोग्राफर प्रीतम को साथ लिया और प्रियंका के घर पहुंच गया. वहां से उसने प्रियंका की सहेलियों के घर-घर जाकर प्रियंका के बारे में ढेर सारी जानकारियां इकठ्ठी कीं
उधर रंजना ने अपना काम शुरु कर दिया. वह उस गांव के प्रधान को जानती थी. उसका मोबाइल नंबर भी उसके पास था. उसने प्रधान चौधरी मलखान सिंह को फोन लगाया- 'प्रधान जी मैं 'जनचेतना' से रंजना बोल रही हूं. कल आपके गांव के पास कुछ लोगों ने एक लड़की सुनीता के साथ बलात्कार करने के बाद उसे जिन्दा जला दिया. उस घटना के बारे में आपको तो पता ही होगा.' प्रधान रंजना की बात बीच में ही काटते हुए बोला- 'अरे मैडम यहां तो ऐसी घटनाएं आए दिन घटती रहती हैं. आप क्यों परेशान होती हैं. वैसे घटना कोई खास नहीं है जी! वैसी ही है जैसी गांव में होती है. अरे सच तो ये है कि इन ससुरों से अपनी लड़कियां संभाली नहीं जाती. जब ऊंच-नीच घट जाती है तो पुलिस में दौडे़-दौडे़ फिरते हैं. हमारे गांव के पास कुछ दिहाड़ी मजदूरों की झुग्गी है. उसी झुग्गी में बंसी की बेटी रात को शायद शौच-वौच को गई थी. वहीं कुछ लड़कों ने उसके साथ बातचीत करनी चाही तो उसने जुबान लडा़नी शुरू कर दी. बस लड़कों को ताव आ गया और ये घटना घट गई. अरे क्या जरूरत थी उसे उन लड़कों से जबान लडा़ने की.' रंजना को प्रधान की बातों से समझ में आ गया कि वह घटना को अपने मन की कहानी बना कर सुना रहा है. रंजना ने फोन रख दिया. लेकिन इतनी बातों से ही रंजना को अंदाजा हो गया कि जरूर सुनीता ने उन अत्याचारियों के आगे घुटने टेकने के बजाय उनका मुकाबला करना ही बेहतर समझा होगा. रंजना को लगा कि यहां बैठे-बैठे खबर की असलियत निकलना मुश्किल है, इसलिए वहां खुद जाना होगा. वह गांव की ओर चल पड़ी.
इधर प्रियंका के मामले में शिद्दत से काम कर रहे भास्कर का काम तेजी पर था. अब उसे  इसी कडी में कुछ और जाने-माने लोगों के इंटरव्यू लेने थे. वह प्रियंका के स्कूल गया. उसने प्रियंका की दूसरी शिक्षिकाओं और कुछ पड़ोसियों से भी बात की. सबने उसे बेहद होशियार और शांत रहने वाली सभ्य-शालीन लड़की बताया और उसकी बहुत तारीफ की. उसने स्कूल में प्रियंका की पिछले पांच सालों की रिपोर्ट कार्ड निकलवाई. गंभीरता से उसका आकलन करने के बाद उसने अपने अखबार के लिए खबर बनाई- 'हमेशा फर्स्ट आने की सजा...।' इस खबर में उसने बाकायदा प्रियंका का रिपोर्ट कार्ड भी छापने के लिए भेजा. खबर उसी शीर्षक के साथ उतने ही महत्त्व के साथ छापी गई. खबर के बीच में रिपोर्ट कार्ड में प्रियंका को मिले ग्रेड को एक गोल घेरा बना कर हाइलाइट किया गया था.
उधर रंजना पता पूछते-पूछते जब सुनीता के घर पहुंची तो घर के नाम पर अधबनी कच्ची झोपडी़, फूस की छत और मिट्टी से लीपा हुआ फर्श. दो टूटी खाट और उन पर तह करके दो मैली रजाइयां रखी थी. कोने में रस्सी की अरगनी पर एक पुरानी साड़ी और एक मैली-कुचेली पैबंद लगी पैंट टंगी हुई थी. मिट्टी की दीवार के बीचोंबीच एक फोटो टंगा था. फोटो सुनीता का ही था. बड़ी-बड़ी खूबसूरत चहकती-सी आंखें, स्कूल के साधारण कपड़ों में भी चेहरे पर अनोखी चमक दीख रही थी. सुनीता का फोटो देख रंजना भावुक हो गई. इस बीच उसके सुनीता के बारे में बारे पूछते ही घर में फिर से रोआराट मच गया. सुनीता की मां बेटी का नाम लेकर फिर रोने लगी. रंजना ने सुनीता की मां को चुप कराते-कराते पूछा- 'सुनीता, कौन-सी क्लास में पढ़ती थी.' उसने बताया कि वो दसमीं का पेपर देने वाली थी और खूब पढ़ाकू थी. हम तो सुबह ही उसके बापू के साथ काम पर चले जाते थे. लेकिन वह स्कूल से आने के बाद अपने आप पढ़ती थी और घर का सारा काम भी करती थी. कभी-कभी गली -गांव के बच्चों को भी पढ़ाती देती थी.' उसने रमबतिया के आंसू पोंछते हुए कहा- 'ये सब कैसे हुआ?' रमबतिया ने बताया कि सुनीता उस दिन जब स्कूल से लौटी तो उसने हमें बताया कि गांव के चौधरी का लड़का मुकेश उसका रास्ता घेर कर उसे छेड़ते हुए बोला- ' अरी ओ इन्दिरा गांधी, पढ़-लिख कर क्या कलेक्टर बनेगी?' हमरी बिटिया को गुस्सा आ गया और उसने पलट कर कह दिया कि हां, बनूंगी कलेक्टर बोल तू क्या करेगा? और अगर मैं किसी दिन कलेक्टर बन गई तो इतने डंडे लगवाऊंगी कि तू किसी भी लड़की से बात करने लायक नहीं रहेगा.'
यह कह कर वह घर आ गई. जब उसने मुझे बताया तो मैंने उसे कहा था कि इन लोगों के मुंह मत लग बिटिया. तू अपनी पढ़ाई अच्छी तरह से कर. लेकिन रात जब सुनीता खेतों में गांव की दो लड़कियों के साथ शौच को गई तो वहीं चौधरी के लड़के ने उसे दो और लड़को के साथ दबोच लिया. उसके साथ जबर्दस्ती जो चाहा किया. हमरी बिटिया ने भागना चाहा तो उन कमीनों ने उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी.
रंजना ने उसे सांत्वना देते हुए कहा- 'धीरज रखो काकी. वे लोग पकड़े गए कि नहीं.' रमबतिया ने कहा- 'कहां बिटिया, वे तो खुल्ले घूम रहे हैं. उल्टे पुलिस हमें धमका रही है कि कहीं रिपोर्ट नहीं करना, नहीं तो हम तुम्हारे आदमी को उठा ले जाएंगे. वे हमारी बिटिया की आखिरी निशानी साइकिल भी ले गए. कह रहे थे कि सुनीता इससे स्कूल जाती थी. जांच के लिए इस साइकिल का ले जाना जरूरी है


रंजना ने तसल्ली दिया और कहा कि दिल्ली में मेरा एक जानकार पत्रकार है. सुनीता के साथ जो भी हुआ, मैं उसकी पूरी खबर उसे भेजूंगी. मैं उसमें सब लिख दूंगी कि कैसे अपराधी खुल्ले घूम रहे हैं और पुलिस वाले कैसे आपको तंग कर रहे है.' इसके बाद रंजना वहां से वापस आ गई. उसने शाम को भास्कर को फोन लगाया और पूरी घटना बताई. रंजना ने भास्कर को बताया कि मुझे लगता है कि अगर सुनीता दलित नहीं होती तो शायद इस तरह क्रूर तरीके से उसकी हत्या नहीं होती. सच तो यह है कि गरीब-दलित समाज की होने के बावजूद उसका पढ़ना-लिखना और साहसी होना ही गांव के दबंगों की नजर में चढ़ गया था. इसीलिए उसे जिंदा जलाकर मार डालने से पहले बलात्कार के जरिए दबंगों ने यह बताने की कोशिश की कि उसके जैसी जमात की लडकियों के लिए पढ-लिखकर भविष्य के सुनहरे सपना देखना कितना त्रासद हो सकता है. यह स्पष्ट तौर पर जातीय द्वेष और अत्याचार का मामला है. सब कुछ बताने के बाद रंजना ने भास्कर से कहा- 'देखो, खबर जरा मजबूत तरीके से बनाना, ताकि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई हो सके. मैं भी 'जनचेतना' की तरफ से पुलिस स्टेशन जाकर पुलिस वालों से बात करती हूं.' भास्कर ने रंजना का शुक्रिया किया.
रंजना से बात करने के बाद भास्कर को लगा कि सुनीता का केस बहुत ही साधारण है और आज की पत्रकारिता की भाषा में कहें तो 'लो प्रोफाइल' है. गांवों में ऐसी न जाने कितनी घटनाएं घटती रहती हैं. अखबारों में कितना और कब तक इनके बारे में छपता रहेगा. सुनीता के साथ बलात्कार करने वालों में अगर कोई नेता, मंत्री या ऊंचे कद का राजनीतिज्ञ शामिल होता तो खबर अच्छी बनती. उसे भी इस तरह के अन्याय के खिलाफ लिखने में संतोष होता. और भास्कर ने अपने अखबार में सुनीता के बारे में जो खबर बना कर दी, वह कुल  सौ-सवा शब्दों की रही होगी, जिसे किसी कोने में जगह मिल जाती तो अखबार की मेहरबानी ही होती. इसके बाद भास्कर ने सुनीता की कहानी को सिर से झटक दिया और फिर पूरी ताकत से प्रियंका केस में जुट गया.
 इसमें कोई शक नहीं कि भास्कर आज का एक बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार था. वह सोच रहा था कि वह प्रियंका केस में अपने अखबार को क्या ऐसी खबर दे जो सबसे पहली और सबका ध्यान खींचने वाली हो. उसके ध्यान में श्रुति का नाम घूम गया. श्रुति महिलाओं के मुद्दों पर एक स्वयंसेवी संगठन चलाती थी. कभी-कभार अपने कार्यक्रमों में वह भास्कर को भी बुला लेती थी और इस नाते श्रुति से भास्कर की थोड़ी जान-पहचान हो गई थी. उसने श्रुति को फोन लगाया. उधर से श्रुति की चहक भरी आवाज आई- 'अरे भास्कर जी, कैसे याद किया हमें?' भास्कर ने तुरंत गम्भीरता से कहा- 'मुझे प्रियंका केस में आपकी स्टेटमेंट चाहिए. आपके अलावा दो-चार आपकी जैसी बहादुर महिलाओँ के नाम भी चाहिए जो महिलाओं मुद्दों पर काम कर रही हों. अगले दिन छह महिला प्रतिनिधियों के स्टेटमेंट सहित बड़ी खबर छपी- 'प्रियंका के लिए न्याय की लडा़ई में महिला संगठन आगे आए...!'
भास्कर के काम की तारीफ होने लगी. भास्कर को अब और कुछ नया करना था. उसने श्रुति को फिर फोन लगाया और कहा- 'श्रुति जी, क्या आप 'प्रियंका केस' को लेकर कोई विरोध जताने जा रही हैं?' श्रुति ने कहा- 'फिलहाल ऐसा कोई इरादा तो नहीं, लेकिन आप कहें तो विरोध कर सकते हैं.' भास्कर ने श्रुति को आइडिया देते हुए कहा- 'क्या आप कुछ महिला संगठनों की औरतों को साथ लेकर प्रियंका के मामले पर कैंडल मार्च कर सकती हैं? अगर ऐसा कर सकें तो मैं भी अपने सभी पत्रकार दोस्तों को इन्फॉर्म कर दूंगा. हम सब भी शमिल हो जाएंगे.' अगले दिन भास्कर के बाइलाइन से पहले पन्ने पर बड़ी खबर छपी थी- 'प्रियंका मामले पर भड़का अवाम, कल कैंडल मार्च.' भीड़ इकठ्ठी करने के लिए लिए एसएमस जैसी सुविधाओं का भी सहारा लिया गया. कैंडल मार्च में अत्याधुनिक दिखने वाली महिलाओं से लेकर स्कूल-कॉलेज के बच्चे, स्वयंसेवी-सामाजिक संस्थाओँ के लोगों के साथ एक विशाल पत्रकार समूह ने प्रियंका की बडी़-बडी़ फोटो हाथों में लिए जंतर-मंतर की सड़क पाट दी. चारों तरफ मर्द, औरतें, बच्चे प्रियंका की फोटो के होर्डिंग पकड़े मौन कैंडल मार्च कर रहे थे.
चारों तरफ 'प्रियंका केस' की चर्चा थी। कैंडल मार्च का सिलसिला दिल्ली से शुरू होकर पूरे देश में फैल गया. हर रोज कहीं न कहीं विरोध प्रदर्शन होने लगे. उसकी खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर और टीवी के प्रमुख समाचारों का हिस्सा बन रहे थे. लोग प्रियंका को आत्महत्या के लिए उकसाने वाले के लिए सजा देने की मांग कर रहे थे और नौकरशाह को सजा न देने के लिए सरकार और न्याय व्यवस्था पर लानत भेज रहे थे. सबसे बडी़ बात यह थी कि पूरा मीडिया प्रियंका के केस में बेहद संवेदनशील था. और आखिरकार प्रियंका को न्याय दिलाने में मीडिया की जीत हुई. प्रियंका की मौत के जिम्मेदार नौकरशाह को आखिरकार एक साल की जेल हो ही गई. स्त्री अस्मिता के मुद्दों पर समाज में मीडिया की इस सकारात्मक भूमिका के लिए खासकर भास्कर और उसके अखबार की प्रशंसा में फेसबुक, ब्लॉग आदि पर लेख लिखे जा रहे थे. भास्कर को सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित बेहतरीन पत्रकारिता के लिए सरकार की ओर से पुरस्कृत करने की घोषणा की गई.
चंद रोज बाद रंजना टीवी के सामने बैठी थी. प्रियंका को न्याय दिलाने में मीडिया और खासकर भास्कर की भूमिका पर केंद्रित कार्यक्रम चल रहा था. इसी बीच टीवी की एंकर ने बताया कि अब हम आपको सीधे उस समारोह में लिए चलते हैं जहां प्रियंका को न्याय दिलाने के अभियान की कमान थामने वाले पत्रकार भास्कर को मुख्यमंत्री के हाथों पुरस्कृत किया जा रहा है. रंजना का मुंह कसैला हो रहा था, आंख और कान में कुछ चुभने लगा था कि इसी बीच उसके फोन की घंटी बजी. उधर से बोलने वाले ने रोते-रोते कहा- 'मैडम जी, जब से हमारी बिटिया गई, आपके अलावा हमारी किसी ने नहीं सुनी. जगह-जगह जाकर सिर पटकता हूं. जिन्होंने हमारी बिटिया को मार डाला, वे मुझे कहीं आने-जाने पर भी धमकाते हैं. पीठ पीछे सब कहते हैं कि हमारी बिटिया का चरित्र ही खराब था. मैडमजी अब हमें कुछ नहीं चाहिए. हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे. सुना है पुलिस वाले अखबार और चैनल वालो से डरते हैं. आपकी तो बहुत लोगों से जान-पहचान है. किसी अखबार-चैनल वाले से कहवा कर बस हमारी बिटिया की साइकिल हमें वापस दिलवा दीजिए, हमें कुछ और नहीं चाहिए...।'
फोन पर रोने वाला सुनीता का पिता था- एक 'लो प्रोफाइल' बेटी का 'लो प्रोफाइल' बाप.
रंजना की निगाह फिर टीवी पर गई. मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री महोदय भास्कर के गले में फूलों का हार पहनाने के बाद उसके हाथ में प्रशस्ति-पत्र सौंप रहे थे. कैमरों के फ्लैश चकाचक चमक रहे थे. अखबारों के पत्रकार अपने नोटपैड पर तेजी से कलम चला रहे थे. टीवी चैनलों के पत्रकार मुख्यमंत्री और भास्कर की बाइट लेने के लिए मोर्चा संभाल चुके थे. देश की राजधानी में मीडिया अपने नायक के सम्मान का सीधा-प्रसारण कर रहा था! (END)



लेखिका दलित लेखक संध की महासचिव हैं. साथ ही 1992 से दिल्ली प्रशासन में हिन्दी पी.जी.टी के पद पर कार्यरत हैं. इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आप उन्हें anita.bharti@gmail.com पर मेल कर सकते हैं या फिर 9899700767 पर संपर्क कर सकते हैं.

No comments:

Post a Comment